सोमवार, मई 31, 2010

बेलगाम लाल आतंक, सहमी है सरकार!

ये नक्सलवादी नहीं, आतंकवादी हैं। आम आदमियों के हक की जंग लड़ने का दावा करने
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प. मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) में नक्सलियों ने 27 मई को हावड़ा-कुर्ला ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को निशाना बनाकर 200 से ज्यादा मुसाफिरों की हत्या कर दी।
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वाले नक्सली अब आम लोगों का ही खून बहा रहे हैं। नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में जब सुरक्षा बल के जवानों को निशाना बनाया तो उनका तर्क था कि जो हमें मारते हैं, हमने उन्हें मारा। लेकिन दंतेवाड़ा में जिस बस को निशाना बनाया गया, उसमें सुरक्षा बल के चंद जवानों को छोड़ कर बाकी तो आम आदमी ही थे। पश्चिमी मिदनापुरमें जिस ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को निशाना बनाया, उसमें भी तो आम आदमी ही सवार थे। नक्सली अपने ही देश के बेगुनाह लोगों का खून बहाकर ये कैसी जंग लड़ रहे हैं?
नक्सलबाड़ी से जब आंदोलन की शुरुआत हुई तो बेशक आम जनता के हकूक की बात उठी होगी, लेकिन अब ये आम लोगों को ही लूटते हैं। उनसे ही लेवी और फिरौती वसूल रहे हैं। ज़रा अंदाजा लगाइए
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आतंकियों और लुटेरों से अलग नहीं रहे नक्सली
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माओवादी अपने देश में साल भर में फिरौती से
कितनी कमाई करते होंगे। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि ये रकम करीब 2 हजार करोड़ रुपये है। इस रकम से नक्सली हथियार और गोला-बारूद खरीदते हैं और बचा धन अपने बेनामी बैंक खातों में जमा कर देते हैं। ये पैसा ऊंचे तबके के नक्सली नेताओं का काला धन होता है।
जब कोई भी विचार आंदोलन बनता है तो आगे चलकर उसमें कुछ मतलबी लोग भी शामिल हो ही जाते हैं। नक्सलवाद के साथ भी यही हुआ। मार्क्स-लेनिन और माओ के रास्ते से गुजरने वाले इस आंदोलन को स्वार्थी नेताओं ने आतंकवाद की राह पर डाल दिया। करतूतें ऐसी रहीं कि इनकी आइडियोलॉजी से भी लोगों का भरोसा उठ गया। लिहाजा दबदबा बनाए रखने के लिए अब इनके पास सिर्फ बंदूक का सहारा है।
नक्सली आज जो कुछ कर रहे हैं वो आतंकवाद भी है और देश के खिलाफ जंग भी। आतंक को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता, औऱ देश के खिलाफ जंग छेड़ने वालों को माफ नहीं किया जा सकता।
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बिहार के रोहतास जिले का एक स्कूल, जिसे नक्सलियों ने जमींदोज़ कर दिया।
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लिहाजा, नक्सलियों से भी उसी तरह निपटना होगा, जिस तरह देश के दुश्मन से निपटा जाता है। नक्सलियों के हिमायती कहते हैं, ‘नेताओं की जमात देश में समस्याएं खड़ी करने वाले कुछ मुद्दे हमेशा जिंदा रखती हैं। नक्सलवाद ऐसा ही मुद्दा है।’ इनका ये भी कहना है कि ‘नक्सली सताए गए लोग हैं। जुल्मों के विरोध में हथियार उठाने वालों को आतंकी कह कर मार डालना नाइंसाफी होगी। इन्हें बातचीत के जरिये समाज की मुख्य धारा में लाया जाना चाहिए। आखिर वो विदेशी तो हैं नहीं, अपनी ही धरती के लोग हैं।’
इस तरह की बातें करने वालों से चंद सवालात के जवाब मांगना चाहूंगा। पहला सवाल ये, कि अगर किसी पर जुल्म हुआ तो हो क्या उसे बेगुनाहों के कत्ल का लाइसेंस मिल जाता है? खालिस्तान की मांग करने वाले भी तो अपने ही दश के लोग थे, क्या उनके खिलाफ सख्ती करके कोई गलती की गई? जरा सोचिए, श्रीलंका में एलटीटीई के नेता और छापामार भी श्रीलंका के ही नागरिक थे, क्या श्रीलंका ने उनका सफाया करके कोई गलती कर दी?
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नक्सली देश के सात राज्यों - बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में बड़े इलाके पर अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं।
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नक्सलियों के हिमायती ये भी कहते हैं कि पिछड़े इलाकों में अगर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलें, तो नक्सल समस्या खुद खत्म हो जाएगी। कोई इन्हें बताए कि नक्सली अपने ही हाथों से स्कूलों की इमारतों को तहस-नहस कर देते हैं। रही बात रोजगार की, तो नक्सली जब इलाके में विकास योजनाएं चलने ही नहीं देंगे, तो रोजगार के मौके कहां से पैदा होंगे। ये अस्पतालों पर हमला कर डॉक्टरों की हत्या कर देते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे मुहैया कराई जाकती हैं?
दरअसल नक्सली लोगों को सुविधाएं से महरूम रखना चाहता है। अगर लोगों को विकास योजनाओ का लाभ मिलने लगा तो असंतोष की वो आग ही बुझ जाएगी, जिस पर वो अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। इसी तरह विधायकों, सांसदों और मंत्रियों का भी एक तबका है, जो नहीं चाहता कि इलाके का विकास हो। पिछड़ापन इन नेताओं के लिए काफी फायदेमंद है। ये जानते हैं कि गरीबों के वोट सस्ते में खरीदे जा सकते हैं। लोग अमीर हुए तो उनके वोट की कीमत भी बढ़ जाएगी। नेता ये भी जानते हैं कि ज्यादा से ज्यादा दलाली तभी कमाई जा सकती है, जब विकास योजनाएं डिस्टर्ब्ड इलाकों में चलाई जाएं। नेता बार बार स्कूल बनवाते हैं और नक्सली इन्हें बार बार तबाह कर देते हैं। जाहिर है जितनी बार बिल्डिंग बनेगी, नेताओं को दलाली से अपनी जेब भरने का मौका भी उतनी ही बार मिलेगा।
नक्सलियों के खिलाफ जब भी सख्ती की बात होती है,
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जनता मांगे जवाब : सिर्फ बयानों की बाजीगरी से कब तक काम चलाएंगे गृह मंत्री जी?
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मानवाधिकार
संगठन ढाल बन कर खड़े हो जाते हैं। क्या
मानवाधिकार सिर्फ नक्सलियों के लिए है? क्या नक्सलियों का शिकार होने वालों का कोई मानवाधिकार नहीं? जरूरत सिर्फ नक्सलियों से ही निपटने की नहीं है, मानवाधिकार के नाम पर दुकानदारी चलाने वालों को सबक सिखाने की भी है।
गृह मंत्री पी चिदंबरम मान चुके हैं कि उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के बहुत सारे इलाक़े ऐसे हैं, जहां पिछले करीब दो दशक से प्रशासन दखल देने की हिम्मत नहीं जुटा सका है। यानी ये वो इलाक़े हैं जो पूरी तरह से माओवादियों के नियंत्रण में हैं औऱ यहां इनकी सामानांतर सरकार चलती है।
नक्सली अब खतरे का लाल निशान पार कर चुके हैं। इसके इलाज के लिए सरकार को कड़े कदम उठाने ही होंगे। लेकिन सरकार का कोई कदम उम्मीद पैदा करने वाला नहीं लगता। हर हमले के बाद मंत्री कड़े बयान देते है, और हर कड़े बयान के बाद नतीजा सिफर रहता है। आखिर सरकार नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई की कूबत क्यों नहीं दिखा रही? क्या उसे अभी कुछ और मौतों का इंतज़ार है?

1 टिप्पणी:

  1. सत्य वचन। अब तो लगता है सरकार नक्सलियों से भी दलाली खाने लगी है।

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